प्रगतिशील समाजवाद के परचम वाहक शिवपाल जी

प्रगतिशील समाजवाद के परचम वाहक शिवपाल जी

बसंत पंचमी के पवित्र दिन साहित्य जगत में महाप्राण के विभूषण से विभूषित सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘‘निराला’’ का जन्म हुआ था, जिन्होंने अपनी कलम और कला को आम आदमी व वंचित वर्ग का स्वर बनाया तथा पूँजीवादी शोषण को सीधी चुनौती दी। उनकी सहाफत व साहित्य का केन्द्र बिन्दु कभी भिखारी तो कभी पत्थर तोड़कर पेट भरने के लिए विवश कोमलांगी नारी होती थी। जिन्होंने अबे सुन बे गुलाब, भूल मत गर पाई खुश्बू रंग-ओ आब, खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट, डाल पर इतरा रहा कैपिटलिस्ट, जैसी कालजयी पंक्तियाँ लिखीं और हिन्दी काव्य को नया आयाम दिया। वे समाजवाद व सामाजिक सद्भाव के महाकवि थे। रूढ़िभंजक महाप्राण जिस धारा के कवि थे, उसी धारा के राजनेता व क्रान्तिधर्मी चिन्तक राममनोहर लोहिया ने 1955 में अलग सोशलिस्ट (समाजवादी) पार्टी का गठन किया था, ताकि गरीबों व कमजोरों की निर्णायक लड़ाई लड़ी जा सके। इसी वर्ष (1955) में सुघर सिंह व मूर्ति देवी के पुत्र तथा लोहिया के अनन्य अनुयायी मुलायम सिंह के अनुज के रूप में शिवपाल का जन्म हुआ। आज लोहिया की समाजवादी उपागम व शिवपाल दोनों साठवें वर्ष के सोपान पर हैं।

छोटे लोहिया जनेश्वर मिश्र के शब्दों में शिवपाल गरीबों और कार्यकर्ताओं का आदमी तथा नेताजी मुलायम सिंह यादव के ‘‘लक्ष्मण’’ व ‘‘हनुमान’’ दोनों हैं। शिवपाल अपनी वय और कद के नेताओं में सबसे अलग एवं विशिष्ट हैं, इसके कई कारण हैं जिनमें उनकी स्वाभाविक सहजता, सादगी, सिद्धान्तों के प्रति प्रतिबद्धता, कथनी-करनी की एका, मानवीय सरोकार, पारदर्शी लोक जीवन, रचनाधर्मिता का सम्मान, सहयोगी प्रवृत्ति व एक वैश्विक मानवीय दृष्टिकोण विशेषरूप से उल्लेखनीय हैं। जनता से जुड़े सरोकारों के लिए जनसंघर्ष हेतु हमेशा तत्पर रहने वाले शिवपाल में मानवीय संवेदनायें कूट-कूट कर भरी हुई हैं। राजनीति की कठोर वीथिका व कटु अनुभवों की कड़वाहट से उन्होंने अपने किरदार की मधुरता को बचाए रखा, यह छोटी बात नहीं है। अपनी निश्चल मुस्कान के लिए प्रसिद्ध शिवपाल जी की सदैव कोशिश रहती है कि उनके हाथों कभी अन्याय न हो और वे लोगों की मुस्कुराहट के कारण व कारक बनते रहें। एक अभिभावक की भाँति कार्यकर्ताओं की पीडा को महसूस कर दूर करने की सहज प्रवृत्ति ने ही उन्हें चाचा की उपाधि दिलाई है। हमारी उम्र के साथी ज्यादातर उनका नाम लेने की बजाय चाचा ही कहते हैं।

उत्तर प्रदेश की राजनीति के पर्याय शिवपाल जब सरकार में होते हैं तो गरीबों व कमजोर तबके के जीवनमान को सुधारने के लिए कार्ययोजनायें बनाकर दृढ़तापूर्वक लागू करवाते है और जब विपक्ष में होते हैं तो जनता के सवालों पर संघर्ष करते हुए अग्रिम पंक्ति में दिखते हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश के नेता प्रतिपक्ष के रूप में लोकबन्धु राजनारायण, चैधरी चरण सिंह व मुलायम सिंह की परम्परा को आगे बढ़ाया और विधानसभा से प्रतिकार के स्वर को कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया। वे प्रारम्भ से ही राजनीतिक तथा सामाजिक क्रिया-कलापों में अभिरुचि रखते थे।

1972-73 से राजनीतिक सभाओं के आयोजन की जिम्मेदारी उठाने लगे थे। 1974 में बी०पी०एड० करने के बाद शिक्षक का चयन-पत्र आया लेकिन उन्होंने राजनीति का कंटकाकीर्ण पथ का चयन किया। आपातकाल का दंश झेला। मुलायम सिंह जी के गिरफ्तार होने के बाद समाजवादियों के मनोबल को गिरने नहीं दिया। 1980-81 में इटावा और औरेया के सभी कालेजों में बाबा रामनरेश समेत कई छात्रसंघ अध्यक्ष बनवाए। इसी दौरान समाजवादी पदयात्रा में दिल्ली तक पैदल चले। वे 1988 में इटावा सहकारी बैंक व 1994 में उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक के अध्यक्ष निर्वाचित हुए।

जिला सहकारी बैंक की कार्यशील पूँजी को अपने कुशल प्रबन्धन और ईमानदार प्रयासों से 40 करोड़ रुपये से 400 करोड़ रुपये तक पहुँचाया। 20 नवम्बर 2008 को लगातार तीन बार शील्ड जीतने के बाद उन्हें राष्ट्रपति भारत-रत्न कलाम साहब द्वारा सहकारिता रत्न सम्मान दिया गया। एक साल इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष रहने के बाद उन्हें नेताजी व समाजवादी पार्टी ने कद्दावर दर्शन सिंह यादव के विरुद्ध जसवंतनगर से प्रत्याशी बनाया। उस समय प्रदेश में उनका दल विपक्ष में था, सभी दल शिवपाल हराओ अभियान में लग गए लेकिन शिवपाल जी 11 हजार मतों से जीते, तब से जसवन्तनगर के यश के वंत बने हुए हैं। सोलहवीं विधानसभा चुनाव में उन्हें रिकार्ड 1 लाख 35 हजार 5 सौ 63 वोट मिले। सत्तरवीं अर्थात वर्तमान विधानसभा चुनाव में भी उन्हें 1 लाख 26 हजार 8 सो 34 मत मिले जो सभी प्रत्याशियों के कुल वोटों से भी अधिक है। उन्हें संगठन बनाने व चलाने के तथा चुनाव जीतने व जितवाने में सिद्धहस्त माना जाता है। वे 1997 से 2007 तक सपा के प्रमुख महासचिव, 01 नवम्बर 2007 से 21 नवम्बर 2008 तक कार्यकारी अध्यक्ष तत्पश्चात् जून 2009 तक प्रदेश अध्यक्ष रहे। इन्होंने सपा को उत्तर प्रदेश में शीर्ष तक पहुँचाया। बहुमत की सरकार बनवाई और जब इनकी उपेक्षा हुई, इन्हें किनारे किया गया तो सपा की बहुमत वाली सरकार को अब तक की सबसे बड़ी व बुरी पराजय मिली।

शिवपाल भले ही मधुलिमए की तरह समाजवाद के व्याख्याता न हों लेकिन समाजवाद की परिभाषा एक वाक्य में अपने उद्बोधनों में अक्सर दोहराते हैं कि गरीबों के आँसू पोंछना ही समाजवाद है। वे भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता (वीटो पावर) और हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के अभियान के सूत्रधार तो हैं ही साथ ही साथ इण्डो मारिशस सोशलिस्ट काउन्सिल के अध्यक्ष भी हैं। लगभग 45 लेख और दो पुस्तकें लिख चुके शिवपाल को लोहिया के सभी भाषणों को संरक्षित करने व उनकी पेनड्राइव बनवाने के लिए काफी सराहना मिली। शिवपाल जी यथावत् स्वस्थ व सक्रिय रहें। हमारी शुभकामनायें हैं कि वे भारत व उत्तर प्रदेश की राजनीति के जाज्वल्यमान सूर्य बनें और 21वीं सदी में समाजवादी पहरुआ के रूप में अक्षुण्ण ख्याति अर्जित करें।

-दीपक मिश्र

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