दिल की रह गुज़र से
महान समाजवाद चिन्तक व स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राममनोहर लोहिया की पुण्यतिथि के दिन 12 अक्टूबर, 1938 को जन्मे उर्दू के नवप्रवर्तनकारी शायरों में अग्रगण्य निदा फाज़ली ने लिखा है
“हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी,
जिसको भी देखना हो कई बार देखना,
दरिया के उस किनारे सितारे भी फूल भी,
दरिया चढ़ा हो तो उस पार देखना,
दो-चार गाम राह को हमवार देखना“
ये पंक्तियां उन्होंने जिसके लिए भी चाहे जिस संदर्भ में लिखी हों किन्तु जिस वर्ष राममनोहर लोहिया ने हैदराबाद में सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की थी, उसी वर्ष 1955 के वसंत पंचमी के पवित्र दिन संवेदनशील सुघर सिंह व करुणा की मूरत मूर्ति देवी के पुत्र तथा 21वीं सदी में भारतीय समाजवाद के शिखर पुरुष मुलायम सिंह के अनुज के रूप में जन्मे शिवपाल के प्ररिप्रेक्ष्य में सटीक व शब्दशः सही प्रतीत होती हैं। हृदय की चित्र-विथिका में उनकी अनेकानेक तस्वीरें विद्यमान हैं, हर तस्वीर उनकी अलग-अलग भूमिकाओं का प्रतिनिधित्व करती ह...
समाजवादी संघर्ष के नायक
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और सामाजिक विकृतियों के खिलाफ बहुआयामी संघर्ष करने वाले डाॅ0 लोहिया का स्मरण कर रहे हैं-शिवपाल यादव
डाॅ0 राममनोहर लोहिया का नाम उन महान भारतीयों में अग्रगण्य है जिन्होंने समाज में व्याप्त विकृतियों के विरुद्ध बहुआयामी संघर्ष किया और राजनीति की संत परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने अमेरिका में जाकर रंग-भेद के खिलाफ सत्याग्रह किया, गिरफ्तार हुए और वैश्विक मानवता का संदेश दिया कि इंसान और इंसानी तकाजों मंे भेद नहीं होना चाहिए। अमेरिकी जनमानस को स्वामी विवेकानंद के बाद सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाले एशियाई डाॅ0 लोहिया ही रहे। हैरिस वोफोर्ड जैसे कई अमेरिकियों ने लोहिया पर लेख और पुस्तकें लिखी। अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन की सफलता का श्रेय यदि डाॅ0 लोहिया और उनकी समाजवादी टोली को दिया जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। तत्कालीन वायसराय वार्ड लिथलिथगो की गोपनीय रिपोर्ट और मैक्स हरकोर्ट के शोध का निष्कर्ष भी यहीं ह...
सादगी भरा सक्षम नेतृत्व
एक राजनेता के रूप में चौधरी चरण सिंह के व्यक्तित्व और कार्यों का स्मरण कर रहे हैं
चौधरी चरण सिंह का नाम उन नेताओं में अग्रणी है, जिन्होंने आजादी के बाद देश के नवनिर्माण, लोकतंत्र तथा समाजवादी आंदोलन को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और सार्थक परिवर्तन के रेखांकित करने योग्य अध्यायों के सूत्रधार बने। उन्होंने पंडित नेहरू की ऐश्वर्ययुक्त धारा के समानांतर चलने वाली आचार्य नरेन्द्र देव, डॉ. लोहिया, लोकनायक जयप्रकाश नारायण की ऋषि व त्यागमयी परंपरा को आगे बढ़ाया। वह देशज भाषा, तकनीकी तथा पूंजी के आधार पर देश की समग्र तरक्की चाहते थे। उन्हें अर्थशास्त्र की गहरी समझ व जानकारी थी। उन्होंने महात्मा गांधी की आर्थिक अवधारणाओं की समसामयिक व तात्विक दृष्टि से विवेचना की और सरकार में आते ही दृढ़तापूर्वक लागू करवाया। 23 दिसंबर, 1902 को मेरठ के छोटे से गांव नूरपुर के एक साधारण कृषक परिवार में चौधरी मीर सिंह के पुत्र के रूप में जन्मे चौ...
जननायक कर्पूरी ठाकुर की विरासत
प्रख्यात समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर उन नेताओं मंे अग्रगण्य हैं जिन्होंने महात्मा गाँधी, डा0 राममनोहर व लोकनायक जयप्रकाश नारायण की राजनीति की संत परम्परा को आगे बढ़ाया और समाजवादी अवधारणाओं को मूर्तरूप दिया। उसकी सादगी बेमिसाल थी और तर्कशक्ति अद्भुत थी। 24 जनवरी, 1921 को बिहार के समस्तीपुर जिले के एक गांव पितौंझिया मंे गोकुल प्रसाद ठाकुर और श्रीमती रामदुलारी देवी के पुत्र के रूप में जन्मे कर्पूरी जी में जनसेवा व देशभक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी। उन्होंने सार्वजनिक जीवन की शुरूआत महात्मा गाँधी के नमक सत्याग्रह से की, मेधावी छात्र होने के बावजूद सुनहरे भविष्य के सपने को स्वयं ही तिलांजलि देते हुए पढ़ाई छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम के कंटकाकीर्ण पथ के परंतप पथिक बन गये। 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान के डा0 राममनोहर लोहिया के सम्पर्क में आये और जीवन पर्यन्त उनके अनुयायी बने रहे। मैक्स हरकोर्ट के शोध से स्पष्ट होता है कि 1942 मंे भूमि...
नेताजी का चिंतन व समाजवाद
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जितने महान देशभक्त, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व योद्धा थे, उतने ही महान चिन्तक व दर्शनिक भी थे। वे प्रतिबद्ध समाजवादी थे, उन्होंने कई अवसरों पर स्वयं को समाजवादी कहते हुए समकालीन समाजवादियों एवं समाजवादी दर्शन की उन्मुक्त मन व मंच से प्रशंसा की। मैंने सुभाषचन्द्र बोस के कई ऐतिहासिक वक्तव्यों का अध्ययन किया तो पाया कि यदि नेताजी के हाथों आजादी के बाद देश की बागडोर आती तो भारत पूरी तरह से समाजवादी देश हो चुका होता और इतनी असमंजस्य की स्थिति न होती। 19 फरवरी 1938 को हरिपुरा (गुजरात) कांग्रेस अधिवेशन मंे अपने अध्यक्षीय उद्बोधन मंे उन्होंने कहा कि मेरे मन में किसी प्रकार का संदेह नहीं है कि हमारी मुख्य राष्ट्रीय समस्याएँ जो गरीबी, अशिक्षा और बीमारी के उन्मूलन से एवं वैज्ञानिक उत्पादन और वितरण से सम्बन्धित हैं, समाजवादी आधार पर ही प्रभावशाली ढंग से सुलझाई जा सकती हैं। इसके पूर्व रंगपुर राजनैतिक सम्मेलन (30 मार्च 1929) ...
राजनीतिक संत थे रामशरण दास,ईमानदारी व समाजवाद की प्रतिमूर्ति थे रामशरण दास
लोकतंत्र और समाजवाद की स्वर्णिम अवधारणा को धरती पर उतारने और मूर्तरूप देने के लिए जीवन-पर्यन्त सतत् संघर्ष करने वाले सेनानियों का उल्लेख जब भी, जहाँ भी और जैसे भी होगा, रामशरण दास जी का जिक्र बडे़ ही श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जायेगा। उन्होंने राजनीति की संत परम्परा और देशज शैली को अपनी अद्भुत दृढ़ता, जीवटता और सांगठनिक क्षमता से आगे बढ़ाया। उन्होंने कभी भी दोहरा चरित्र नहीं अपनाया, वे सही अर्थों में मनस्वी थे क्योंकि मनस्वी व्यक्ति जो सोचते हैं, वही वाणी से अभिव्यक्त करते हैं और वही उनके आचरण में भी दृष्टिगोचर होता है (मनस्येकं, वचस्येकं कर्मण्येकं मनस्विनाम्)। वे मनसा-वाचा-कर्मणा समाजवादी थे। उनके जीवन दर्शन और राजनीतिक कार्य-प्रणाली से लोक-जीवन में ईमानदारी, सादगी, सहजता, सरलता, सिद्धान्तनिष्ठा और पारदर्शी बने रहने की प्रेरणा मिलती है।
सहारनपुर के छोटे से गाँव अलाउद्दीनपुरा में 1927 में आज ही
(3 जुलाई) के दिन बलवंत सिंह नम्बरदार ...
सादगी भरा सक्षम नेतृत्व
भारत के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री व उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अर्थशास्त्री व शीर्ष क्रम के राजनीतिज्ञ चैधरी चरण सिंह का नाम उन नेताओं में अग्रगण्य है, जिन्होंने आजादी के बाद देश के नवनिर्माण, लोकतंत्र तथा समाजवादी आंदोलन को मजबूत करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और सार्थक परिवर्तन के रेखांकित करने योग्य अध्यायों के सूत्रधार बने। उन्होंने पंडित नेहरू की ऐश्वर्ययुक्त धारा के समानान्तर चलने वाली आचार्य नरेन्द्र देव डा0 लोहिया लोकनायक जयप्रकाश नारायण की ऋषि व त्यागमयी परम्परा को आगे बढ़ाया। वे देशज भाषा, तकनीकी तथा पूँजी के आधार पर देश की सर्वतोन्मुखी तरक्की चाहते थे। उन्हें अर्थशास्त्र की गहरी समझ व जानकारी थी। उनकी पुस्तक भारतीय अर्थनीति ( India's Economic Policy ) पढ़ने के बाद पता चलता है कि यदि वे राजनेता न होते तो दुनिया के सबसे बड़े अर्थशास्त्रियों में एक होते। उन्होंने महात्मा गांधी की आर्थिक अ...
लोहिया के लेनिन व समाजवाद के प्रणेता मुलायम सिंह
भारतीय राजनीति विशेषकर आपातकाल के उपरान्त की राजनीति में मुलायम सिंह एक ध्रुव के तारे की तरह स्वयं को स्थापित किया और आज समाजवादी पक्ष के केन्द्र बिन्दु हैं। उन्होंने आचार्य नरेन्द्रदेव, लोकनायक जयप्रकाश नारायण व डा0 लोहिया द्वारा प्रारम्भ की गई परम्परा और परचम को लोकबंधु राजनारायण, मधुलिमये, चैधरी चरण सिंह के बाद आगे बढ़ाया। 1939 में सैफई जैसे छोटे से गाँव में एक साधारण परिवार में जन्में नेताजी उन विभूतियों में से एक हैं जिन्होंने अपना मुकाम एक लम्बे व सत्त संघर्ष के बाद बनाया व पाया है। महज 15 साल की अवस्था में 1954 में डा0 लोहिया के आह्वान पर किसानों की समस्या को लेकर जेल जाने वाले नेताजी में रचनात्मक बेचैनी बाल्यकाल से ही रही है। उनका छोटा भाई व कार्यकर्ता होने के कारण मैं इसका साक्षी हूँ। उनमें रचना व संघर्ष का अद्भुत समन्वय है। पिता श्री सुघर सिंह जी से साहस संघर्ष व जीवटता तथा माता मूर्ति देवी से करुणा व आचरण उन्हें विरासत में मिला...
चौधरी चरण सिंह प्रेरक-जीवन दर्शन
चौधरी चरण सिंह भारतीय राजनीति की उस परम्परा के अनमोल मोती हैं जो महात्मा गांधी से शुरू होती है और सरदार पटेल - डा0 लोहिया से होते हुए आगे बढ़ती है तथा जनता के हित एवं सिद्धान्तों के लिए किसी भी ताकत से टकराने से नहीं हिचकती। चरण सिंह को किसानों के दुःख - दर्द का सबसे बड़ा प्रवक्ता कहा जाय तो गलत न होगा। बीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में किसानों के दो सबसे बड़े नेता हुए, एक सरदार बल्लभभाई पटेल और दूसरे चौधरी चरण सिंह। दोनों महात्मा गांधी से प्रभावित थे, दोनों देश के उपप्रधानमंत्री व गृहमंत्री बने, चौधरी साहब प्रधानमंत्री तक हुए दोनों ने लम्बा सतत संघर्षमय लोकजीवन जिया और देश के नवनिर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उत्तर प्रदेश की राजनीति में 1967 से लेकर 1987 तक के दौर को चरण सिंह युग की संज्ञा दी जा सकती है। भले ही वे देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री व उत्तर प्रदेश के दो बार के मुख्यमंत्री रहे हों लेकिन उनका नाम, कद, और प्रतिष्ठा हमेशा पदों से...
हमारे आदर्श जनेश्वर मिश्र ‘‘छोटे लोहिया’’
‘छोटे लोहिया’ के नाम से प्रसिद्ध जनेश्वर मिश्र हमारे अभिभावक और आदर्श थे। समाजवादी दर्शन को हम लोगों ने जनेश्वर जी के माघ्यम से ही जाना। उन्होंने राजनीतिक शिक्षक की तरह बहुत कुछ सिखाया। मैं जब भी दिल्ली जाता, उनके 8, राजेन्द्र प्रसाद स्थित आवास पर जाकर घंटों बैठता, उनसे राजनीति के ऐतिहासिक तथ्यों के साथ-साथ समसामयिक घटनाओं की भी जानकारी मिलती थी। उनमें अनोखी विश्लेषण क्षमता और तर्कों के माध्यम से अपनी बात रखने की अद्भुत कला थी।
जनेश्वर जी के मन में हमेशा गरीबों और कमजोरांे के लिए पीड़ा रही है। वे मुझसे अक्सर कहते थे कि गरीबों के आंसू पोछना ही सच्चा समाजवाद है। वे एक चलते-फिरते ज्ञान-कोष थे। कभी भी धन-दौलत के पीछे नहीं भागे, न ही संपदा का संचय किया। वे कई बड़े पदों पर रहे, कई बार केन्द्रीय मंत्री बने लेकिन उनमें कभी पद व सत्ता का दर्प नहीं आया। उन्होंने अपनी सादगी और सरलता नहीं छोड़ी। वह आजादी के समय के समाजवादियों और हम लोगों की पीढ़ी क...