नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जितने महान देशभक्त, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व योद्धा थे, उतने ही महान चिन्तक व दर्शनिक भी थे। वे प्रतिबद्ध समाजवादी थे, उन्होंने कई अवसरों पर स्वयं को समाजवादी कहते हुए समकालीन समाजवादियों एवं समाजवादी दर्शन की उन्मुक्त मन व मंच से प्रशंसा की। मैंने सुभाषचन्द्र बोस के कई ऐतिहासिक वक्तव्यों का अध्ययन किया तो पाया कि यदि नेताजी के हाथों आजादी के बाद देश की बागडोर आती तो भारत पूरी तरह से समाजवादी देश हो चुका होता और इतनी असमंजस्य की स्थिति न होती। 19 फरवरी 1938 को हरिपुरा (गुजरात) कांग्रेस अधिवेशन मंे अपने अध्यक्षीय उद्बोधन मंे उन्होंने कहा कि मेरे मन में किसी प्रकार का संदेह नहीं है कि हमारी मुख्य राष्ट्रीय समस्याएँ जो गरीबी, अशिक्षा और बीमारी के उन्मूलन से एवं वैज्ञानिक उत्पादन और वितरण से सम्बन्धित हैं, समाजवादी आधार पर ही प्रभावशाली ढंग से सुलझाई जा सकती हैं। इसके पूर्व रंगपुर राजनैतिक सम्मेलन (30 मार्च 1929) में उन्होंने समाजवाद की अवधारणा को भारतीय समाज के अनुकूल व यहां की ही धारणा बताया था। 27 मार्च, 1931 को आॅल इंडिया नौजवान सभा (कराची) में बतौर अध्यक्ष बोलते हुए नेताजी ने अपनी इच्छा जाहिर की ’’मैं भारत मंे समाजवादी गणतंत्र चाहता हूँ। मैं पूर्ण, समग्र और अमंद स्वतंत्रता का संदेश देना चाहता हूँ।’’ 04 जुलाई 1931 को कोलकाता में हुए अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस मंे उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कह दिया, ’’मेरे मस्तिष्क में कोई संदेह नहीं है कि संसार की तरह भारत का परित्राण समाजवाद पर निर्भर है। उनकी सलाह थी कि,’’भारत को समाजवाद को अपने प्रकार से विकसित करना चाहिए। समाजवाद के उस प्रकार में जो भारत विकसित करेगा, कुछ नया और मौलिक होगा, जो सम्पूर्ण विश्व के लिए लाभदायक भी होगा,’’ सुभाषचन्द्र बोस की इस सलाह को भारतीय समाजवादियों विशेषकर डा0 राममनोहर लोहिया ने माना और भारतीय समाजवाद की धारणा दी। डा0 लोहिया से उनका काफी लगाव था। दोनों ने कई कार्यक्रमों में एक साथ सहभागी की भूमिका का निर्वहन किया। 1928 के युवक सम्मेलन में विषय निर्वाचन समिति के अध्यक्ष सुभाष जी थे और डा0 लोहिया इस समिति के सदस्य थे। अखिल बंग विद्यार्थी परिषद की अध्यक्षता नेता जी को करना था, लेकिन उनके न आ पाने पर डा0 लोहिया ने सदारत की। इससे स्पष्ट होता है कि दोनों का समर्थक समूह एक ही था। विचारधारा ही नहीं कार्य प्रणाली के स्तर पर भी भारतीय समाजवादी आंदोलन को सुभाषचन्द बोस ने किसी भी अन्य नेता की तुलना में सर्वाधिक प्रभावित किया है। आजाद हिन्द फौज के तर्ज पर ही भारतीय समाजवादियों ने भारत छोड़ो आन्दोलन (1942) के दौरान आजाद-दस्ते का गठन किया था जिसने नेपाल के हनुमाननगर पुलिस स्टेशन से डा0 लोहिया व जयप्रकाश नारायण को मुक्त कराया था। यह दस्ता भी गुरिल्ला वार में विश्वास रखता था किन्तु अनावश्यक हिंसा का विरोधी था। भूमिगत होने के बाद 1944 में डा0 लोहिया ने सुभाष बाबू ने सम्पर्क का प्रयास किया किंतु असफल रहे। दोनों ने रेडियो और साहित्य का जन-जागरण मंे खूब इस्तेमाल किया। 23 जनवरी, 1987 को कटक में जन्मे सुभाष बाबू स्वराज पार्टी के मुख्य पृष्ठ ’’फारवर्ड’’ के भी संपादक रहे। वे काफी मेधावी छात्र रहे, 1913 मंे मिशनरी स्कूल से मैट्रिक, 1915 मंे एफ0ए0 फिर दर्शन शास्त्र स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। 1920 में सुभाष बाबू ने भारतीय सिविल सर्विस की परीक्षा पास करने के बाद इस्तीफा देकर पूरे देश को अचम्भित कर दिया। इंग्लैण्ड से वापस आने के बाद नेताजी देशबंधु चितरंजन दास से जुड़े। उनके कलकत्ता के मेयर बनने पर इन्हें मुख्य कार्यकारी बनाया किया, किन्तु स्वतंत्रता संग्राम में प्रतिकार व प्रतिरोध को स्वर देने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया। वे 1921 से लेकर 1941 के मध्य ग्यारह बार गिरफ्तार व रिहा हुए। 1921 में मांडले जेल मंे उनके साथ अवर्णनीय अमानवीय व्यवहार हुआ और असहनीय यातना दी गयी। 1927 में फेफड़ा खराब हो गया, वजन भी 40 पौंड से अधिक घट गया किन्तु उनकी जीजीविषा, संघर्ष क्षमता व लोकप्रियता एक इंच भी न घटी।
10 मई, 1936 को पूरे भारत मंे ’सुभाष दिवस’ मनाया गया। देखते ही देखते नेताजी हिन्दुस्तान की अस्मिता और स्वाभिमान के प्रतीक-पुरूष बन गये। 20वीं शताब्दी के पूर्वाद्ध तक वे साम्राज्यवाद के सबसे प्रखर विरोधी स्वर बन चुके थे, 1938 में नेताजी कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए 1939 में दोबारा महात्मा गाँधी की अनिच्छा के बावजूद अध्यक्ष चुने गये, किन्तु ऐसे घटनाक्रम हुए कि उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर फारवर्ड ब्लाक का गठन करना पड़ा। ब्रिटानिया हुकूमत ने उन्हंे नजरबन्द कर लिया पर वे कहाँ कैद मंे रह सकते थे? जिसे नियति ने मानवता को मुक्त करने के लिए धरती पर भेजा हो वो कैसे खुद कैद रह सकता था। पठान जियायुद्दीन का भेष बनाकर पेशावर फिर काबुल पहुँचे। उन्हें हिटलर, मुसोलिनी व काउन्ट के साथ-साथ जापान का भी पूरा समर्थन मिला, बर्लिन व रोम रेडियो से नेताजी के कई वक्तव्य प्रसारित हुए, जिसे पूरी दुनिया ने सुना। इन विचारों ने एक नई वैचारिक क्रान्ति को जन्म दिया और स्वतंत्रता तथा समाजवाद के पक्ष में वातावरण का सृजन किया। 04 जुलाई, 1942 को रास बिहारी बोस ने उन्हें आजाद हिन्द फौज का विधिवत् सेनापति घोषित किया। 21 अक्टूबर, 1993 को सिंगापुर में नेताजी ने आजाद भारत की अस्थाई सरकार स्थापित की जिसे जापान इटली, जर्मनी समेत कई देशों ने मान्यता दे दी। इससे उनकी वैश्विक स्वीकारिता का पता चलता है। उन्होंने अण्डमान निकोबार द्वीप को भी स्वतंत्र कराया। 18 मार्च, 1944 को उन्होंने ब्रिटानिया हुकूमत की सेना को कोहिमा व मणिपुर मोर्चे से पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया। वायु सेना के अभाव में भले ही अपनी जीतों को वे स्थाई रूप न दे पाये किंतु इतिहास को कई अमर अध्याय देने में सफल रहे। 23 अगस्त, 1945 के पश्चात् नेताजी कभी सार्वजनिक रूप से दिखे नहीं। नेताजी के विचार और स्वतंत्र भारत को समृद्ध व समाजवादी देश बनाने की संकल्पना अभी भी अधूरी है। देश में गरीबी, बेरोजगारी, भूख, साम्प्रदायिकता जैसी बीमारियां अभी भी फैली हुई है। अच्छे लोगों की उदासीनता से वे दुःखी रहते थे। वे चाहते थे कि देश का नेतृत्व अच्छे राजनीतिक कार्यकर्ताओं के हाथ में हो। वे राजनीति कार्यकर्ताओं के शिक्षण और प्रशिक्षण के पैरोकार थे ताकि भविष्य में अच्छे नेताओं की जमात तैयार हो। उन्होंने कंाग्रेस अध्यक्ष के बनने पर यह कार्यक्रम शुरू किया थो जो उनके जाने के बाद अपने आप बंद हो गया। वे गृह और कुटीर उद्योगों के पक्षधर थे, उनका मानना था कि भारत जैसे देश में विदेशी पूँजी और भारी उद्योगों पर आधारित है। उन्होंने हरिपुरा अधिवेशन में हिन्दी और उर्दू के मिश्रण वाली भाषा की वकालत की थी जिसे डा0 लोहिया ने बाद में सामन्ती भाषा के विरोध के रूप में पारिभाषित किया। टोकियो विश्वविद्यालयों के छात्रों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने जिस समाजवादी राजनीतिक दर्शन और अर्थशास्त्र की व्याख्या की थी वो आज पहले से अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता था। नेताजी के विचार और उनका साहित्य हमारी ऐसी विरासत है, जिस पर प्रत्येक भारतीय को सदैव गर्व रहेगा।
दिल की रह गुज़र से