एक राजनेता के रूप में चौधरी चरण सिंह के व्यक्तित्व और कार्यों का स्मरण कर रहे हैं
चौधरी चरण सिंह का नाम उन नेताओं में अग्रणी है, जिन्होंने आजादी के बाद देश के नवनिर्माण, लोकतंत्र तथा समाजवादी आंदोलन को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और सार्थक परिवर्तन के रेखांकित करने योग्य अध्यायों के सूत्रधार बने। उन्होंने पंडित नेहरू की ऐश्वर्ययुक्त धारा के समानांतर चलने वाली आचार्य नरेन्द्र देव, डॉ. लोहिया, लोकनायक जयप्रकाश नारायण की ऋषि व त्यागमयी परंपरा को आगे बढ़ाया। वह देशज भाषा, तकनीकी तथा पूंजी के आधार पर देश की समग्र तरक्की चाहते थे। उन्हें अर्थशास्त्र की गहरी समझ व जानकारी थी। उन्होंने महात्मा गांधी की आर्थिक अवधारणाओं की समसामयिक व तात्विक दृष्टि से विवेचना की और सरकार में आते ही दृढ़तापूर्वक लागू करवाया। 23 दिसंबर, 1902 को मेरठ के छोटे से गांव नूरपुर के एक साधारण कृषक परिवार में चौधरी मीर सिंह के पुत्र के रूप में जन्मे चौधरीसाहब की स्पष्ट मान्यता थी कि भारी उद्योगों तथा विदेशी पूंजी पर आधारित अर्थव्यवस्था से देश का भला नहीं हो सकता। वह छोटे, मंझले व कुटीर उद्योगों तथा कृषि को संरक्षण एवं प्राथमिकता देनी वाली नीतियों के प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने स्वदेशी अवधारणा को आगे बढ़ाया। आज उनके विचार पहले से भी अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। यदि वह जीवित होते तो किसी भी दशा में इतने विदेशी पूंजी निवेश की अनुमति नहीं देने देते। उनका मानना था कि मशीनें यदि मानव श्रम की पूरक हैं तो स्वागत है, लेकिन मानव के विकल्प के रूप में मशीनों का उपयोग घातक होगा।
चरण सिंह चाहते थे कि भारत के गांव-गांव में छोटे-छोटे उद्योग लगें, देश व समाज का उत्पादन बढ़े। उनकी आशंका थी कि उत्पादन को बड़े शहरों में स्थापित बड़ी पूंजी व बड़ी मशीनों वाले कारखानों तक सीमित कर देने से भारतीय अर्थव्यवस्था चैपट हो जाएगी और आर्थिक विषमता घटने की जगह बढ़ेगी। उनकी आशंका कालांतर में सही निकली। अमीरी-गरीबी की खाई और गहरी हुई। आजादी के वक्त भारत व उत्तर प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय में मात्र 12 रुपये का अंतर था। आज यह अंतर बढ़कर पचहत्तर रुपये के स्तर तक पहुंच चुका है। आठ प्रांतों की औसत आमदनी 25 हजार रुपये से भी कम है तो वहीं दिल्ली, हरियाणा व गोवा की प्रति व्यक्ति आय दो लाख रुपये से अधिक है। चौधरी चरण सिंह ने डॉ. लोहिया की देशज शैली व सादा जीवन उच्च विचार की कार्यप्रणाली को आगे बढ़ाया। चौधरी साहब ने आजादी की लड़ाई में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। वे एक मेधावी छात्र थे। 1923 में आगरा कॉलेज से विज्ञान में स्नातक हुए फिर परास्नातक तथा कानून की डिग्री हासिल कर गाजियाबाद में वकालत करने लगे। आगरा कॉलेज में अध्ययन के दौरान छात्रावास में दलितों के साथ सहभोज करने के कारण उन्हें निकाल दिया गया। वह प्रारंभ से ही रूढ़ियों के विरोधी रहे। जहां उन्हें गलत लगा, लड़े।
1930 में बापू के नमक सत्याग्रह में भाग लेते हुए पहली गिरफ्तारी दी। 1931 में मेरठ जिला परिषद के अध्यक्ष बने। 1936 के काउंसिल चुनाव में चौधरी साहब ने ब्रितानिया हुकूमत द्वारा समर्थित प्रत्याशी खेतड़ी के जमींदार दलेराम की जमानत जब्त करवा दी। किसानों की समस्या को लेकर जिलाधिकारी कार्यालय का घेराव करने के कारण उन्हें 28 अक्टूबर, 1940 को डेढ़ साल के लिए पुनः जेल भेज दिया गया। छूटने के बाद भारत छोड़ो आंदोलन को सफल बनाने में लग गए।
चौधरी चरण सिंह कर्मयोगी थे। आजादी के बाद वह देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के कृषि व राजस्व मंत्री बने। भूमि सुधार, चकबंदी तथा जमींदारी उन्मूलन जैसे दुरूह कार्य को बड़ी कुशलता से संपन्न किया। उन्होंने कांग्रेस छोड़ना स्वीकारा, लेकिन जन सवालों को उठाना नहीं छोड़ा। 3 अप्रैल, 1967 को वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के मुखिया के रूप में कई हतप्रभ कर देने वाले प्रशंसनीय कार्य किए। लोकतंत्र को ताकतवर बनाने के लिए भारतीय लोकदल का गठन किया। 18 फरवरी, 1970 को दोबारा उत्तर प्रदेश की कमान संभाली। पहली बार राज्य लोक सेवा आयोग में किसी दलित (दौलतराम निम) की नियुक्ति हुई। चार कैबिनेट मंत्री इस वर्ग से बनाए गए। आपातकाल के खिलाफ वह लड़े और 1977 के चुनाव में सीधी टक्कर ली। जनता पार्टी सरकार में उन्हें गृह तथा वित्त जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय दिए गए। उन्होंने 1902 के बाद पहली बार पुलिस आयोग गठन कर पुलिस को मानवीय बनाने की कवायद शुरू की। वित्त मंत्री के रूप में भारी उद्योगों पर कर लगाया ताकि छोटे व कुटीर उद्योग को संबल मिले। दबाव को नकारते हुए 120 वस्तुओं के उत्पादन पर पाबंदी लगाकर बड़े उद्योगों के एकाधिकार को तोड़ा। 28 जुलाई, 1979 को उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप शपथ ली। प्रधानमंत्री बनने के बाद वह उसी सरकारी आवास में रहे जिसमें बतौर सांसद रहते थे। उन्होंने मुलायम सिंह यादव को अपना उत्तराधिकारी भी घोषित किया। वह काबिलियत व श्रम की कद्र करते थे। वह सदैव चमक-दमक से अप्रभावित रहे। 1985 में किसानों का मसीहा बीमार पड़ा और विचारों की अनमोल विरासत आने वाली नस्ल को सौंपते हुए 29 मई, 1987 को इस दुनिया से विदा ली। आज चौ धरीसाहब जैसे नेतृत्व की देश को जरूरत है। उनके जीवनदर्शन से सादगी, प्रतिबद्धता, सतत संघर्ष, मितव्ययिता और गांव से जुड़े रहने की सीख मिलती है।
दिल की रह गुज़र से