प्रख्यात समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर उन नेताओं मंे अग्रगण्य हैं जिन्होंने महात्मा गाँधी, डा0 राममनोहर व लोकनायक जयप्रकाश नारायण की राजनीति की संत परम्परा को आगे बढ़ाया और समाजवादी अवधारणाओं को मूर्तरूप दिया। उसकी सादगी बेमिसाल थी और तर्कशक्ति अद्भुत थी। 24 जनवरी, 1921 को बिहार के समस्तीपुर जिले के एक गांव पितौंझिया मंे गोकुल प्रसाद ठाकुर और श्रीमती रामदुलारी देवी के पुत्र के रूप में जन्मे कर्पूरी जी में जनसेवा व देशभक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी। उन्होंने सार्वजनिक जीवन की शुरूआत महात्मा गाँधी के नमक सत्याग्रह से की, मेधावी छात्र होने के बावजूद सुनहरे भविष्य के सपने को स्वयं ही तिलांजलि देते हुए पढ़ाई छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम के कंटकाकीर्ण पथ के परंतप पथिक बन गये। 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान के डा0 राममनोहर लोहिया के सम्पर्क में आये और जीवन पर्यन्त उनके अनुयायी बने रहे। मैक्स हरकोर्ट के शोध से स्पष्ट होता है कि 1942 मंे भूमिगत रहते उन्होंने ब्रिटानिया हुकूमत खूब छकाया। गिरफ्तारी के पश्चात कैदियों को मानवीय सुविधाएँ दिलाने के लिए भागलपुर जेल में 27 दिन तक भूखे रहे। 1945 में जेल से रिहा होने के पश्चात् कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य बने, अपनी संघर्ष क्षमता, जीवटता व जीवंतता के बल पर उन्होंने एक अलग पहचान बनाई। आजादी के कर्पूरी जी ने समाजवाद व संघर्ष का रास्ता अपनाया। सोशलिस्ट पार्टी तथा किसान मजदूर पार्टी की एकता कराने में उनकी बड़ी भूमिका थी। वे बिहार के नेता प्रतिपक्ष, उप मुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री के अलावा लोकसभा सदस्य व संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तक रहे, किंतु उनकी सादगी और सहजता यथावत् बनी रही। सत्ता और पद का दर्प व दिखावा उन्हें छू न सका। मुख्यमंत्री रहते हुए भी वे मोटर साइकिल से ही कार्यक्रमों में भाग लेने पहुँच जाते थे। अपनी पुत्री की शादी में सरकारी सेवाओं का लाभ लेने से मना कर दिया और मात्र 12 हजार रुपये में पुत्री की शादी की। उनकी ईमानदारी पर विरोधी भी अंगुली उठाने का साहस न जुटा सके। वे जिस कुटी में पैदा हुए उसी में आखिरी साॅस ली। उन्हें निजी सम्पत्ति का मोह कभी छू न सका। आज के दौर में उनका जीवन दर्शन उदाहरणीय है। आपातकाल का उन्होंने भूमिगत रहते हुए विरोध किया। गरीबों तथा पिछड़ों के लिए उनके मन में अपार पीड़ा थी। उन्होंने लोहिया के विशेष अवसर के सिद्धान्त को ठोस आकार देते हुए आरक्षण व्यवस्था लागू की, पिछड़ों का मुख्य धारा से जोड़ने में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। उनका मानना था कि समाजवाद किसी ठोस (कंक्रीट) प्रोग्राम के आधार पर ही प्राप्त किया जा सकता है। वे जैसा सोचते व बोलते थे, ठीक वैसा ही जीवन जीते थे। इसीलिए डा0 लोहिया ने एक बार उनकी प्रशंसा करते हुए कहा था कि, ’’कर्पूरी का कोई सानी नहीं, वो ऊर्जमेघ है। उसने जिस तरह से समावादी दर्शन को सगुण रूप देकर कार्यान्वित किया, पूरे देश के लिए नजीर है। सर्वोदयी और समाजवादी नीतियों की उन्हें गहरी समझ है’’। कर्पूरी गाँव और शहर तथा अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई से बहुत चिंतित रहते थे। वे छोटे और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना चाहते थे। उनका मानना था कि पश्चिम की अवधारणाएँ भारत के लिए उचित नहीं है, क्योंकि यहां का सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि पश्चिमी जगत जैसा नहीं है। पश्चिम में उत्पादन अधिक है और यहां उपभोक्ता अधिक हैं। यूरोप और अमेरिका जितनी क्रय शक्ति भारत के पास नहीं है। ऐसे में वहां की नीतियाँ व सोच भारत के विकास को एकांगी बना देंगी। उन्होंने देशी भाषा व पूँजी पर आधारित अर्थव्यवस्था की खुली वकालत की। कर्पूरी जी ने हमेशा जातिगत जड़ता को समाज का नासूर बताया। वे समाजवादी नीतियों के अग्रणी पहुरूये और व्याख्याता थे। वे 17 फरवरी, 1988 को प्रातः 9 बजकर 15 मिनट पर महाप्रयाण कर गये।
आज भले ही कर्पूरी जी सशरीर हमारे मध्य न हों किन्तु उनके विचारों की विरासत सदैव हमारा मार्गदर्शन करती रहेगी। वे जितने संघर्षशील थे उतने ही
अध्ययन व मननशील भी। अशोक मेहता की ’’पालिटिकल माइन्ड आॅफ इंडिया’’ ओकासा ’’आइडियल आॅफ द ईस्ट’’ डा0 लोहिया की ’’इतिहास चक्र’’ उनकी पसंदीदा पुस्तकें थीं, जिन्हें वे अक्सर उद्धरित करते रहते थे। उनकी आर्थिक नीति गांव व गरीब के सर्वतोन्मुखी विकास पर आधारित थी। कर्पूरी ने जिन कार्यक्रमों को बिहार में लागू किया यदि वे पूरे देश में क्रियान्वित होतीं तो आज भारत समग्र मानव विकास क्रम मंे 133 देशों से पीछे और प्रति व्यक्ति आय के दृष्टिकोण से देश 159वें पायदान पर न होता। देश का सर्वग्राही विकास सिर्फ महात्मा गाँधी तथा डा0 लोहिया के रास्ते से ही हासिल की जा सकती है, अन्य राह भटकाव भरा व भारतीय समाज के लिए अनुपयुक्त व अप्र्रासंगिक हैं। आडम्बर व चकाचैंध में उलझी राजनीति के सामने जब आदर्शों का अभाव होता जा रहा है, अनासक्त कर्मयोगी कर्पूरी ठाकुर स्मृति स्वाभाविक है।
दिल की रह गुज़र से