लोकतंत्र और समाजवाद की स्वर्णिम अवधारणा को धरती पर उतारने और मूर्तरूप देने के लिए जीवन-पर्यन्त सतत् संघर्ष करने वाले सेनानियों का उल्लेख जब भी, जहाँ भी और जैसे भी होगा, रामशरण दास जी का जिक्र बडे़ ही श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जायेगा। उन्होंने राजनीति की संत परम्परा और देशज शैली को अपनी अद्भुत दृढ़ता, जीवटता और सांगठनिक क्षमता से आगे बढ़ाया। उन्होंने कभी भी दोहरा चरित्र नहीं अपनाया, वे सही अर्थों में मनस्वी थे क्योंकि मनस्वी व्यक्ति जो सोचते हैं, वही वाणी से अभिव्यक्त करते हैं और वही उनके आचरण में भी दृष्टिगोचर होता है (मनस्येकं, वचस्येकं कर्मण्येकं मनस्विनाम्)। वे मनसा-वाचा-कर्मणा समाजवादी थे। उनके जीवन दर्शन और राजनीतिक कार्य-प्रणाली से लोक-जीवन में ईमानदारी, सादगी, सहजता, सरलता, सिद्धान्तनिष्ठा और पारदर्शी बने रहने की प्रेरणा मिलती है।
सहारनपुर के छोटे से गाँव अलाउद्दीनपुरा में 1927 में आज ही (3 जुलाई) के दिन बलवंत सिंह नम्बरदार के पुत्र रूप में जन्मे रामशरण दास जी ने प्रारम्भिक शिक्षा के लिए काफी कठिनाइयाँ झेली। प्रतिदिन पांच किलोमीटर दूर जाकर रामपुर मनिहारन स्थित टाउन स्कूल में प्राथमिक शिक्षा फिर सहारनपुर में हाईस्कूल की पढ़ाई की। स्नातक की डिग्री के लिए देहरादून जाना पड़ा। देशभक्ति उनमें कूट-कूट कर भरी हुई थी। बाल्यावस्था में ही आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। ‘‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’’ आन्दोलन के दौरान नहर काटकर ब्रिटानिया हुकूमत को चुनौती दी और 6 महीने के लिए बरेली जेल में असहनीय यातना सही। वे जेल में ही समाजवादियों के सम्पर्क में आये और पक्के समाजवादी बन गए। आजादी के बाद उन्होंने सत्ता की बजाय जन-पक्ष की राजनीति का वरण किया और डा0 राममनोहर लोहिया की सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े। उनका नाम डा0 लोहिया के प्रतिबद्ध अनुयायियों और लोकबन्धु राजनारायण के साथियों में काफी सम्मान से लिया जाता था। 1971 में लोकबन्धु और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के मध्य हुए चुनाव में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भले ही लोकसभा चुनाव का परिणाम इंदिरा जी के पक्ष में रहा पर देश को पहली बार लगा कि लोकतंत्र इतना ताकतवर हो चुका है कि प्रधानमंत्री भी चुनाव हार सकती हैं। लोकबन्धु राजनारायण ने इंदिरा जी के चुनाव में धाँधली का आरोप लगाते हुए उच्च न्यायालय में निर्वाचन परिणाम को चुनौती दी। रामशरण दास जी मुख्य गवाहों में एक थे, सभी गवाह टूट गए, सिर्फ रामशरण जी न टूटे, न बिके, न झुके। 12 जून, 1975 को इंदिरा जी का चुनाव अवैध घोषित हुआ, इस दौरान जे0पी0 आन्दोलन अपनी लय में था। सरकार ने पूरे देश पर आपातकाल थोप दिया। रामशरण दास जी को भी गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। अब तक वे जनमानस के नायक बन चुके थे और उनकी ईमानदारी की कहानियाँ देश के कोने-कोने में पर्याप्त स्थान पा चुकी थीं। उन्होंने अपनी शोहरत और ताकत का प्रयोग धनार्जन में नहीं किया। वे कबीर की भाँति राजनीति में आए और वैसा ही जीवन जीते हुए 21 नवम्बर, 2008 को महायात्रा पर चले गए। दो बार विधान सभा सदस्य, चार बार विधान परिषद सदस्य, कैबिनेट मंत्री और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े प्रान्त के योजना आयोग के उपाध्यक्ष और समाजवादी पार्टी के लगातार 16 वर्ष प्रदेश अध्यक्ष रहने वाले रामशरण जी के देहान्त के पश्चात् उनके आवास से मात्र 2300 रुपये निकले। वे जितने ईमानदार और उतने ही सहज भी थे। आम कार्यकर्ता भी उनसे कठोर से कठोर और कटु से कटु बात आसानी से कह सकता था। वे 1989 में मुलायम सिंह जी की सरकार में गन्ना विकास, चीनी उद्योग, सहकारिता व राजस्व मंत्री बनाए गए। कैबिनेट मंत्री बनने के बाद भी उनका जीवन सादगी भरा रहा। 1992 में उन्होंने समाजवादी पार्टी के गठन और समाजवादियों के बिखराव को रोकने में निर्णायक भूमिका निभाई। उन्हें ‘‘छोटे लोहिया’’ जनेश्वर मिश्र, प्रख्यात् समाजवादी चिंतक बाबू कपिल देव सिंह एवं मुलायम सिंह जी की अगुवाई में बनी समाजवादी पार्टी का सबसे बड़े और जटिल प्रान्त उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष बनाया गया और गौरवमयी इतिहास साक्षी है कि उनके नेतृत्व में देखते ही देखते समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश की केन्द्रीय ताकत और केन्द्र बिन्दु बन गयी। सपा-बसपा संयुक्त सरकार में उन्होंने कोई राजकीय पद नहीं लिया। वे जब सरकार में होते थे तो रचनात्मक कार्यों को संरक्षण देते थे और विपक्ष में जनाक्रोश के स्वर होते थे। मेरी उनकी पहली मुलाकात 1977 में हुई थी, उनकी सादगी और साफगोई ने मुझे काफी प्रभावित किया। 1996 में मुझे समाजवादी पार्टी का महासचिव बनाया गया। मेरा सौभाग्य है कि मुझे उनका भरपूर सानिध्य, स्नेह और मार्गदर्शन मिला। मैंने संगठन बनाने और चलाने का गुर उनसे और उनकी सन्निकटता से सीखा। मैं स्वयं को उनका ‘‘अर्जुन’’ और ‘‘एकलब्य’’ दोनों कह सकता हूँ। एक बार उनके पुत्र जगपाल दास गुर्जर कई कार्यकर्ताओं के साथ लखनऊ के किसी कार्यक्रम में आये और कार्यकर्ताओं को लोहिया ट्रस्ट में ठहराकर उनके सरकारी आवास पर सोने चले गये। रात को 11 बजे रामशरण दास जी ने अपने बेटे को जगाकर कार्यकर्ताओं के बीच जाकर सोने के लिए भेजा और कहा कि नेता यदि कार्यकर्ता से अलग रहेगा तो अलगाव का भाव बढ़ेगा। ऐसे थे समाजवादी पार्टी की नींव के अनमोल आधार-पुरुष रामशरण दास जी।
मैंने उनके साथ पूरे प्रदेश का भ्रमण किया। जब पूरे प्रदेश में साम्प्रदायिकता की लू चल रही थी, वे मुझे लेकर अयोध्या पहँुचे और सामाजिक सद्भाव बनाने में रेखांकित करने योग्य कार्य किया।
आज वे सशरीर भले ही हमारे मध्य न हों किन्तु उनकी विचार और विरासत हमारा ध्रुव नक्षत्र की भाँति सदैव मार्गदर्शन करती रहेगी। नई पीढ़ी को उनके जीवन-दर्शन से सादगी, ईमानदारी और सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता की सीख व प्रेरणा मिलती है।
(लेखक वरिष्ठ समाजवादी नेता व उत्तर प्रदेश के लोक निर्माण, सिंचाई व सहकारिता मंत्री हंै)
दिल की रह गुज़र से